Digital Sanskrit Buddhist Canon

४ धर्मालोकमुखपरिवर्तश्चतुर्थः

Technical Details
  • Text Version:
    Devanāgarī
  • Input Personnel:
    DSBC Staff
  • Input Date:
    2004
  • Proof Reader:
    Miroj Shakya
  • Supplier:
    Nagarjuna Institute of Exact Methods
  • Sponsor:
    University of the West
Parallel Romanized version

4 dharmālokamukhaparivartaścaturthaḥ

४ धर्मालोकमुखपरिवर्तश्चतुर्थः।



इति हि भिक्षवो बोधिसत्त्वो जन्मकुलं व्यवलोक्य उच्चध्वजं नाम तुषितालये महाविमानं चतुःषष्टियोजनान्यायामविस्तारेण यस्मिन् बोधिसत्त्वः संनिषद्य तुषितेभ्यो देवेभ्यो धर्मं देशयति स्म, तं महाविमानं बोधिसत्त्वोऽभिरोहति स्म। अभिरुह्य च सर्वान् तुषितकायिकान् देवपुत्रानामन्त्रयते स्म-संनिपतन्तु भवन्तः च्युत्याकारप्रयोगं नाम धर्मानुस्मृतिचर्यानुशासनीं पश्चिमं बोधिसत्त्वस्यान्तिकाद्धर्मश्रवणं श्रोष्यथेति। इदं खल्वपि वचनं श्रुत्वा सर्वे तुषितकायिका देवपुत्राः साप्सरोगणास्तस्मिन् विमाने संनिपतन्ति स्म॥



तत्र बोधिसत्त्वेन चतुर्महाद्वीपके लोकधातुविस्तरप्रमाणो मण्डलमात्राधिष्ठितोऽभूत्, तावच्चित्रस्तावद्दर्शनीयस्तावत्स्वलंकृतस्तावत्सुरुचिरो यावत्सर्वे कामावचरा देवा रूपावचराश्च देवपुत्राः स्वेषु भवनव्यूहेषु श्मशानसंज्ञामुत्पादयामासुः॥



तत्र बोधिसत्त्वः स्वपुण्यविपाकनिष्यन्दपरिमण्डिते सिंहासने निषीदति स्म अनेकमणिरत्नपादप्रत्युप्ते अनेकपुष्पसंस्तरसंस्कृते अनेकदिव्यगन्धवासोपवासिते अनेकसारवरगन्धनिर्धूपिते अनेकवर्णदिव्यपुष्पगन्धसंस्तरसंस्कृते अनेकमणिरत्नकृतशतसहस्रप्रभोज्ज्वालिततेजसि अनेकमणिरत्नजालसंछन्ने अनेककिंकिणीजालसमीरिताभिनादिते अनेकरत्नघण्टाशतसहस्ररणितनिर्घोषे अनेकरत्नजालशतसहस्रपरिस्फुटे अनेकरत्नगणशतसहस्रसंछादिते अनेकपट्टशतसहस्राभिप्रलम्बिते अनेकपट्टदाममाल्यशतसहस्रसमलंकृते अनेकाप्सरःशतसहस्रनृत्यगीतवादितपरिगीते अनेकगुणशतसहस्रवर्णिते अनेकलोकपालशतसहस्रानुपालिते अनेकशक्रशतसहस्रनमस्कृते अनेकब्रह्मशतसहस्रप्रणते अनेकबोधिसत्त्वकोटीनियुतशतसहस्रपरिगृहीते दशदिगनेकबुद्धकोटीनियुतशतसहस्रसमन्वाहृते अपरिमितकल्पकोटीनियुतशतसहस्रपारमितासंभारपुण्यविपाकनिष्यन्दसमुद्गते। इति हि भिक्षव एवंगुणसमन्वागते सिंहासने निषद्य बोधिसत्त्वस्तां महतीं देवपर्षदमामन्त्रयते स्म-व्यवलोकयत मार्षा बोधिसत्त्वस्य कायं शतपुण्यलक्षणसमलंकृतम्। व्यवलोकयत पूर्वदक्षिणपश्चिमोत्तरास्वध ऊर्ध्वं समन्ताद्दशदिक्षु अप्रमेयासंख्येयागणनासमतिक्रान्तान् बोधिसत्त्वान्, ये तुषितवरभवनस्थाः सर्वे चरमभवाभिमुखा देवगणपरिवृताश्च्यवनाकारं देवतासंहर्षणं धर्मालोकमुखं संप्रकाशयन्ति। अद्राक्षीत् सा सर्वा देवपर्षद् बोधिसत्त्वाधिस्थानेन तान् बोधिसत्त्वान्। दृष्ट्वा च पुनर्येन बोधिसत्त्वस्तेन साञ्जलिं प्रणम्य पञ्चमण्डलैर्नमस्यन्ति स्म। एवं चोदानमुदानयन्ति स्म-साधु अचिन्त्यमिदं बोधिसत्त्वाधिस्थानं यत्र हि नाम वयं व्यवलोकितमात्रेणेयन्तो बोधिसत्त्वान् पश्याम इति॥



अथ बोधिसत्त्वः पुनरपि तां महतीं देवपर्षदमामन्त्र्यैवमाह-तेन हि मार्षाः शृणुत च्युत्याकारं देवतासंहर्षणं धर्मालोकमुखं यदेते बोधिसत्त्वा एभ्यो देवपुत्रेभ्यो भाषन्ते। अष्टोत्तरमिदं मार्षा धर्मालोकमुखं शतं यदवश्यं बोधिसत्त्वेन च्यवनकालसमये देवपर्षदि संप्रकाशयितव्यम्। कतमत्तदष्टोत्तरशतम्? यदुत श्रद्धा मार्षा धर्मालोकमुखमभेद्याशयतायै संवर्तते। प्रसादो धर्मालोकमुखमाविलचित्तप्रसादनतायै संवर्तते। प्रामोद्यं धर्मालोकमुखं प्रसिद्ध्यै संवर्तते। प्रीति धर्मालोकमुखं चित्तविशुद्ध्यै संवर्तते। कायसंवरो धर्मालोकमुखं त्रिकायपरिशुद्ध्यै संवर्तते। वाक्संवरो धर्मालोकमुखं चतुर्वाग्दोषपरिवर्जनतायै संवर्तते। मनःसंवरो धर्मालोकमुखमभिध्याव्यापादमिथ्यादृष्टिप्रहाणाय संवर्तते। बुद्धानुस्मृतिधर्मालोकमुखं बुद्धदर्शनविशुद्ध्यै संवर्तते। धर्मानुस्मृति धर्मालोकमुखं धर्मदेशनाविशुद्ध्यै संवर्तते। संघानुस्मृति धर्मालोकमुखं न्यायाक्रमणतायै संवर्तते। त्यागानुस्मृति धर्मालोकमुखं सर्वोपधिप्रतिनिःसर्गायै संवर्तते। शीलानुस्मृति धर्मालोकमुखं प्रणिधानपरिपूर्त्यै संवर्तते। देवतानुस्मृति धर्मालोकमुखमुदारचित्ततायै संवर्तते। मैत्री धर्मालोकमुखं सर्वोपधिकपुण्यक्रियावस्त्वभिभावनतायै संवर्तते। करुणा धर्मालोकमुखविहिंसापरमतायै संवर्तते। मुदिता धर्मालोकमुखं सर्वारत्यपकर्षणतायै संवर्तते। उपेक्षा धर्मालोकमुखं कामजुगुप्सनतायै संवर्तते। अनित्यप्रत्यवेक्षा धर्मालोकमुखं कामरूप्यारूप्यरागसमतिक्रमाय संवर्तते। दुःखप्रत्यवेक्षा धर्मालोकमुखं प्रणिधानसमुच्छेदाय संवर्तते। अनात्मप्रत्यवेक्षा धर्मालोकमुखमात्मानभिनिवेशनतायै संवर्तते। शान्तप्रत्यवेक्षा धर्मालोकमुखमनुनयासंघुक्षणतायै संवर्तते। ह्री धर्मालोकमुखमध्यात्मोपशमाय संवर्तते। अपत्राप्यं धर्मालोकमुखं बहिर्धाप्रशमाय संवर्तते। सत्यं धर्मालोकमुखं देवमनुष्याविसंवादनतायै संवर्तते। भूतं धर्मालोकमुखमात्माविसंवादनतायै संवर्तते। धर्मचरणं धर्मालोकमुखं धर्मप्रतिशरणतायै संवर्तते। त्रिशरणगमनं धर्मालोकमुखं त्र्यपायसमतिक्रमाय संवर्तते। कृतज्ञता धर्मालोकमुखं कृतकुशलमूलाविप्रणाशाय संवर्तते। कृतवेदिता धर्मालोकमुखं पराभिमन्यतायै संवर्तते। आत्मज्ञता धर्मालोकमुखमात्मानुत्कर्षणतायै संवर्तते। सत्त्वज्ञता धर्मालोकमुखं परापत्समानतायै संवर्तते। धर्मज्ञता धर्मालोकमुखं धर्मानुधर्मप्रतिपत्त्यै संवर्तते। कालज्ञता धर्मालोकमुखममोघदर्शनतायै संवर्तते। निहतमानता धर्मालोकमुखं ज्ञानतापरिपूर्त्यै संवर्तते। अप्रतिहतचित्तता धर्मालोकमुखमात्मपरानुरक्षणतायै संवर्तते। अनुपनाहो धर्मालोकमुखमकौकृत्याय संवर्तते। अधिमुक्ति धर्मालोकमुखमविचिकित्सापरमतायै संवर्तते। अशुभप्रत्यवेक्षा धर्मालोकमुखं कामवितर्कप्रहाणाय संवर्तते। अव्यापादो धर्मालोकमुखं व्यापादवितर्कप्रहाणाय संवर्तते। अमोहो धर्मालोकमुखं सर्वाज्ञानविधमनतायै संवर्तते। धर्मार्थिकता धर्मालोकमुखमर्थप्रतिशरणतायै संवर्तते। धर्मकामता धर्मालोकमुखं लोकप्रतिलम्भाय संवर्तते। श्रुतपर्येष्टि धर्मालोकमुखं योनिशोधर्मप्रत्यवेक्षणतायै संवर्तते। सम्यक्प्रयोगो धर्मालोकमुखं सम्यक्प्रतिपत्त्यै संवर्तते। नामरूपपरिज्ञा धर्मालोकमुखं सर्वसङ्गसमतिक्रमाय संवर्तते। हेतुदृष्टिसमुद्धातो धर्मालोकमुखं विद्याधिमुक्तिप्रतिलम्भाय संवर्तते। अनुनयप्रतिघप्रहाणं धर्मालोकमुखमनुन्नामावनामनतायै संवर्तते। स्कन्धकौशल्यं धर्मालोकमुखं दुःखपरिज्ञानतायै संवर्तते। धातुसमता धर्मालोकमुखं समुदयप्रहाणाय संवर्तते। आयतनापकर्षणं धर्मालोकमुखं मार्गभावनतायै संवर्तते। अनुत्पादक्षान्ति धर्मालोकमुखं निरोधसाक्षात्क्रियायै संवर्तते। कायगतानुस्मृति धर्मालोकमुखं कायविवेकतायै संवर्तते। वेदनागतानुस्मृति धर्मालोकमुखं सर्ववेदितप्रतिप्रश्रब्ध्यै संवर्तते। चित्तगतानुस्मृति धर्मालोकमुखं मायोपमचित्तप्रत्यवेक्षणतायै संवर्तते। धर्मगतानुस्मृति धर्मालोकमुखं वितिमिरज्ञानतायै संवर्तते। चत्वारि सम्यक्प्रहाणानि धर्मालोकमुखं सर्वाकुशलधर्मप्रहाणाय सर्वकुशलधर्मपरिपूर्त्यै संवर्तते। चत्वार ऋद्धिपादा धर्मालोकमुखं कायचित्तलघुत्वाय संवर्तते। श्रद्धेन्द्रियं धर्मालोकमुखमपरप्रणेयतायै संवर्तते। वीर्येन्द्रियं धर्मालोकमुखं सुविचिन्तितज्ञानतायै संवर्तते। स्मृतीन्द्रियं धर्मालोकमुखं सुकृतकर्मतायै संवर्तते। समाधीन्द्रियं धर्मालोकमुखं चित्तविमुक्त्यै संवर्तते। प्रज्ञेन्द्रियं धर्मालोकमुखं प्रत्यवेक्षणज्ञानतायै संवर्तते। श्रद्धाबलं धर्मालोकमुखं मारबलसमतिक्रमाय संवर्तते। वीर्यबलं धर्मालोकमुखमवैवर्तिकतायै संवर्तते। स्मृतिबलं धर्मालोकमुखमसंहार्यतायै संवर्तते। समाधिबलं धर्मालोकमुखं सर्ववितर्कप्रहाणाय संवर्तते। प्रज्ञाबलं धर्मालोकमुखमनवमूढ्यतायै संवर्तते। स्मृतिसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं यथावद्धर्मप्रजानतायै संवर्तते। धर्मप्रविचयसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं सर्वधर्मपरिपूर्त्यै संवर्तते। वीर्यसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं सुविचित्रबुद्धितायै संवर्तते। प्रीतिसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं समाध्यायिकतायै संवर्तते। प्रश्रब्धिसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं कृतकरणीयतायै संवर्तते। समाधिसंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं समतानुबोधाय संवर्तते। उपेक्षासंबोध्यङ्गं धर्मालोकमुखं सर्वोपपत्तिजुगुप्सनतायै संवर्तते। सम्यग्दृष्टि धर्मालोकमुखं न्यायाक्रमणतायै संवर्तते। सम्यक्संकल्पो धर्मालोकमुखं सर्वकल्पविकल्पपरिकल्पप्रहाणाय संवर्तते। सम्यग्वाग् धर्मालोकमुखं सर्वाक्षररुतघोषवाक्यपथप्रतिश्रुत्कासमतानुबोधनतायै संवर्तते। सम्यक्कर्मान्तो धर्मालोकमुखमकर्माविपाकतायै संवर्तते। सम्यगाजीवो धर्मालोकमुखं सर्वेषणप्रतिप्रश्रब्ध्यै संवर्तते। सम्यग्व्यायामो धर्मालोकमुखं परतीरगमनाय संवर्तते। सम्यक्स्मृति धर्मालोकमुखमस्मृत्यमनसिकारतायै संवर्तते। सम्यक्समाधि धर्मालोकमुखमकोप्यचेतःसमाधिप्रतिलम्भाय संवर्तते। बोधिचित्तं धर्मालोकमुखं त्रिरत्नवंशानुपच्छेदाय संवर्तते। आशयो धर्मालोकमुखं हीनयानास्पृहणतायै संवर्तते। अध्याशयो धर्मालोकमुखमुदारबुद्धधर्माद्यालम्बनतायै संवर्तते। प्रयोगो धर्मालोकमुखं सर्वकुशलधर्मपरिपूर्त्यै संवर्तते। दानपारमिता धर्मालोकमुखं लक्षणानुव्यञ्जनबुद्धक्षत्रपरिशुद्ध्यै मत्सरिसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। शीलपारमिता धर्मालोकमुखं सर्वाक्षणापायसमतिक्रमाय दुःशीलसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। क्षान्तिपारमिता धर्मालोकमुखं सर्वव्यापादखिलदोषमानमददर्पप्रहाणाय व्यापन्नचित्तसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। वीर्यपारमिता धर्मालोकमुखं सर्वकुशलमूलधर्मारङ्गोत्तारणाय कुशीदसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। ध्यानपारमिता धर्मालोकमुखं सर्वज्ञानाभिज्ञोत्पादाय विक्षिप्तचित्तसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। प्रज्ञापारमिता धर्मालोकमुखमविद्यामोहतमोन्धकारोपलम्भदृष्टिप्रहाणाय दुष्प्रज्ञसत्त्वपरिपाचनतायै संवर्तते। उपायकौशलं धर्मालोकमुखं यथाधिमुक्तसत्त्वेर्यापथसंदर्शनाय सर्वबुद्धधर्माविधमनतायै संवर्तते। चत्वारि संग्रहवस्तूनि धर्मालोकमुखं सत्त्वसंग्रहाय संबोधिप्राप्तस्य च धर्मसंप्रत्यवेक्षणतायै संवर्तते। सत्त्वपरिपाको धर्मालोकमुखमात्मसुखानध्यवसानायापरिखेदतायै संवर्तते। सद्धर्मपरिग्रहो धर्मालोकमुखं सर्वसत्त्वसंक्लेशप्रहाणाय संवर्तते। पुण्यसंभारो धर्मालोकमुखं सर्वसत्त्वोपजीव्यतायै संवर्तते। ज्ञानसंभारो धर्मालोकमुखं दशबलप्रतिपूर्त्यै संवर्तते। शमथसंभारो धर्मालोकमुखं तथागतसमाधिप्रतिलम्भाय संवर्तते। विदर्शनासंभारो धर्मालोकमुखं प्रज्ञाचक्षुःप्रतिलम्भाय संवर्तते। प्रतिसंविदवतारो धर्मालोकमुखं धर्मचक्षुःप्रतिलम्भाय संवर्तते। प्रतिशरणावतारो धर्मालोकमुखं बुद्धचक्षुःपरिशुद्ध्यै संवर्तते। धारणीप्रतिलम्भो धर्मालोकमुखं सर्वबुद्धभाषिताधारणतायै संवर्तते। प्रतिभानप्रतिलम्भो धर्मालोकमुखं सर्वसत्त्वसुभाषितसंतोषणायै संवर्तते। आनुलोमिकधर्मक्षान्ति धर्मालोकमुखं सर्वबुद्धधर्मानुलोमनतायै संवर्तते। अनुत्पत्तिकधर्मक्षान्ति धर्मालोकमुखं व्याकरणप्रतिलम्भाय संवर्तते। अवैवर्तिकभूमि धर्मालोकमुखं सर्वबुद्धधर्मप्रतिपूर्त्यै संवर्तते। भूमेर्भूमिसंक्रान्तिज्ञानं धर्मालोकमुखं सर्वज्ञज्ञानाभिषेकतायै संवर्तते। अभिषेकभूमि धर्मालोकमुखमवक्रमणजन्माभिनिष्क्रमणदुष्करचर्याबोधिमण्डोपसंक्रमणमारध्वंसनबोधिविबोधनधर्मचक्रप्रवर्तनमहापरिनिर्वाणसंदर्शनतायै संवर्तते। इदं तन्मार्षा अष्टोत्तरं धर्मालोकमुखशतं यदवश्यं बोधिसत्त्वेन च्यवनकालसमये देवपर्षदि संप्रकाशयितव्यम्॥



अस्मिन् खलु पुनर्भिक्षवो धर्मालोकमुखपरिवर्ते बोधिसत्त्वेन निर्दिश्यमाने तस्यां देवपर्षदि चतुरशीतेर्देवपुत्रसहस्राणामनुत्तरायां सम्यक्संबोधौ चित्तान्युत्पद्यन्ते। द्वात्रिंशतेश्च देवपुत्रसहस्राणां पूर्वपरिकर्मकृतानामनुत्पत्तिकेषु धर्मेषु क्षान्तिप्रतिलम्भोऽभूत्। षट्‍त्रिंशतेश्च देवपुत्रनयुतानां विरजो विगतमलं धर्मेषु धर्मचक्षुर्विशुद्धम्। सर्वावच्च तुषितवरभवनं जानुमात्रं दिव्यैः पुष्पैः संछादितमभूत्॥



इति हि भिक्षवो बोधिसत्त्वस्तस्या देवपर्षदो भूयस्या मात्रया संहर्षणार्थं तस्यां वेलायामिमां गाथामभाषत—



तुषितवरभवननिलयाद्यदा च्यवति नायकः पुरुषसिंहः।

आमन्त्रयते देवान् प्रमादमखिलं विसर्जयत॥१॥



या काचि रतिवियूहा दिव्या महसा विचिन्तिता श्रीमान्।

सर्वशुभकर्महेतोः फलमिदं शृणुरस्य कर्मस्य॥२॥



तस्माद्भवत कृतज्ञा अपूर्वशुभसंचयं क्षपित्वेह।

मा गच्छत पुनरपायानसाध्वसुखवेदना यत्र॥३॥



धर्मश्च यः श्रुतोऽयं ममान्तिके गौरवमुपजनित्वा।

तत्र प्रतिपद्यथा प्राप्स्यथ नियतं सुखमनन्तम्॥४॥



सर्वमनित्य कामा अध्रुवं न च शाश्वता अपि न कल्पाः।

मायामरीचिसदृशा विद्युत्फेनोपमा चपलाः॥५॥



न च कामगुणरतीभिः तृप्तिर्लवणोदकं यथा पीत्वा।

ते तृप्त येष प्रज्ञा आर्या लोकोत्तरा विरजा॥६॥



न तरङ्गतुल्यकल्पाः संगीति च अप्सरोभि संवासः।

अन्योन्यगमयुक्ता यथैव सामायि कामं च॥७॥



न च संस्कृते सहाया न मित्र ज्ञातीजनो च परिवाराः।

अन्यत्र कर्म सुकृतादनुबन्धति पृष्ठतो याति॥८॥



तस्मात्सहितसमग्रा अन्योन्यं मैत्रचित्त हितचित्ताः।

धर्मचरणं चरेथाः सुचरितचरणा न तप्यन्ते॥९॥



बुद्धमनुस्मरेथा धर्मं संघं तथाप्रमादं च।

श्रुतशीलदाननिरता क्षान्त्या सौरभ्यसंपन्नाः॥१०॥



दुःखमनित्यमनात्मा निरीक्षथा योनिशो इमा धर्मा।

हेतुप्रत्यययुक्ता वर्तन्तेऽस्वामिका जडाबुद्ध्या॥११॥



या काचि ऋद्धि मह्यं पश्यत प्रतिभां च ज्ञानगुणतां च।

सर्वशुभकर्महेतोः शीलेन श्रुतेन चाप्रमादेन॥१२॥



अनुशिष्यध्वं मह्यं शीलेन श्रुतेन चाप्रमादेन।

दानदमसंयमेना सत्त्वार्थ हितार्थ मित्रार्थः॥१३॥



न च वाक्यरुतरवेणा शक्याः संपादितुं कुशलधर्मान्।

प्रतिपत्तिमारभेथा यथा च वदथा तथ करोथा॥१४॥



मा खलु परावकाशं स्वयं यतध्वं सदा प्रयत्नेन।

न च कश्चि कृत्व ददते न चाप्यकृत्वा भवति सिद्धिः॥१५॥



समनुस्मरथा पूर्वे यद्दुःखं संसारे चिरमनुभूतम्।

न च निर्वृती विरागो समनुगतो मिथ्य नियतैव॥१६॥



तस्मात्क्षणं लभित्वा मित्रं प्रतिरूप देशवासं च।

श्रेष्ठं च धर्मश्रवणं शमेथ रागादिकान् क्लेशान्॥१७॥



मानमददर्पविगताः सदार्जवामन्दवाश्च अशठाश्च।

निर्वाणगतिपरायण युज्यत मार्गाभिसमयाय॥१८॥



मोहकलुषान्धकारं प्रज्ञाप्रदीपेन विधमथा सर्वम्।

सानुशयदोषजालं विदारयत ज्ञानवज्रेण॥१९॥



किमपि सुबहु वदेयं धर्मं युष्माकमर्थसंयुक्तम्।

न च तत्रवतिष्ठेथा न तत्र धर्मस्य अपराधः॥२०॥



बोधिर्यथा मि प्राप्ता(स्याद्) धर्मं च प्रवर्षयेदमृतगामिम्।

पुनरपि विशुद्धचित्ता उपेथ वरधर्मश्रवणाय॥२१॥ इति॥



इति श्रीललितविस्तरे धर्मालोकमुखपरिवर्तो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥
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